मंत्र सिद्धि में गुरु की आवश्यकता क्यों होती है ?

By | January 4, 2018

मंत्र सिद्धि के लिए साधक को गुरु की नितान्त आवश्यकता होती है | इसलिए साधक अपने लिए सामर्थ्यवान गुरु की खोज करता है और चयन करता है | गुरु भी शिष्य की सुपात्रता से प्रभावित होने के उपरान्त ही अपना शिष्य स्वीकार करता है | जब गुरु साधक को अपना शिष्य बनाता है तभी वह शिष्य को दीक्षित करता है | मंत्र की सिद्धि(Mantra Siddhi me Guru ka Mahtav) और शक्ति की दीक्षा देता है | गुरु अपने शिष्य को मंत्र की दीक्षा शीघ्र भी दे सकता है और देर से भी | वह कब देगा यह नहीं कहा जा सकता है | वह शिष्य को यह समझकर कि यह दीक्षा देने योग्य हो गया है, इसे दीक्षा देना निरर्थक सिद्ध नहीं होगा, यह जानकर उसे उचित समय पर दीक्षा देता है | यह गुरु की इच्छा पर निर्भर करता है |

Mantra Siddhi me Guru ki aavshaykta

गुरु दीक्षा प्राप्त होने के बाद साधक को अपनी साधना का मार्ग सरल व सुगम लगने लग जाता है | उसके अतिरिक्त ज्ञान का विकास हो जाता है जिससे गुरु की शक्ति रूपी दीक्षा से साधक की शारीरिक व मानसिक अशुद्धियाँ स्वयमेव विलुप्त हो जाती है | क्योंकि दीक्षा एक प्रकार से शक्ति रूप व तेजपुंज होता है | इसलिए गुरु की दीक्षा को हमारे भारतीय संस्कृति में एक अमूल्य व श्रेष्ठ शक्तिदान कहा गया है |

मंत्र सिद्धि व साधना में गुरु का महत्व/ Mantra Siddhi me Guru ka Mahtav

गुरु की महानता , श्रेष्ठता सर्वोपरि व निर्विवाद है | शास्त्र में बड़े -बड़े ऋषियों मुनियों द्वारा गुरु को ईश्वर तुल्य ही नहीं अपितु उससे भी महान कहा गया है | ऐसे ऐसे महान गुरुओं का इतिहास गौरवशाली व गरिमापूर्ण है जो वास्तव में ही साधक के लिए ईश्वर से भी बढ़कर सिद्ध हुए है और होते रहेंगे | भगवान राम और कृष्ण ने महर्षि विश्वामित्र , गुरु वशिष्ठ व संदीपन जैसे गुरुओं की शिष्यता ग्रहण कर गुरु की श्रेष्ठता को प्रमाणित किया है |

संत कबीर दास जी ने तो गुरु को महिमा का वर्णन करते हुए कहा है कि : –

गुरु गोबिंद दोउ खड़े , काको लागू पाँव |

बलिहारी गुरु आपनो, गोविन्द दियो बताय ||

अर्थात कबीर दास जी गुरु की महिमा का वर्णन करते हुए कहते है कि मेरे समक्ष गुरु और गोविन्द अर्थात भगवान दोनों ही खड़े है | परन्तु समझ में नहीं आता कि पहले मै किसको प्रणाम करूँ | फिर गुरु की श्रेष्ठता बताते हुए स्वयं ही उत्तर देते है कि हे गुरुवर आप ही श्रेष्ठ व पूज्यनीय है क्योंकि आपने ही तो हमें ईश्वर प्राप्ति का मार्ग व ईश्वर का ज्ञान कराया है | अन्यथा मै तो ईश्वर के सम्बन्ध में बिल्कुल ही अनभिज्ञ था कोरा कागज था | इसलिए गुरु को ही पहले प्रणाम करना चाहिए फिर ईश्वर को |

कबीर दास जी कहते है की यदि ईश्वर रूठ जाये तो गुरु की शरण प्राप्त हो जाती है परन्तु यदि गुरु रूठ जाये तो कहीं भी शरण प्राप्त नहीं होती | इस प्रकार कबीर ने गुरु की श्रेष्ठता का वर्णन किया है | ⇒ ♣ मंत्र सिद्धि के पश्चात् , मंत्र का परिक्षण किस प्रकार करें ? ♣ ⇐

सम्राट चन्द्रगुप्त के राजनैतिक गरु चाणक्य , स्वामी विवेकानंद के धार्मिक गुरु रामकृष्ण परमहंस ये सभी जगत प्रसिद्द हुए है | इसलिए  मंत्र सिद्धि व साधना(Mantra Siddhi me Guru ka Mahtav) के समय किसी सामर्थ्यवान गुरु का होना बहुत आवश्यक है | गुरु द्वारा दीक्षा प्राप्त कर मंत्र सिद्ध करने का मार्ग सरल व सुगम हो जाता है | ⇒ ♣ मंत्र सिद्धि कैसे करें ? ♣ ⇐

 

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2 thoughts on “मंत्र सिद्धि में गुरु की आवश्यकता क्यों होती है ?

  1. Jitendra Goyal

    Guruji pitro ki mukti hetu geeta ji ka path kese kare plzz is PR koi video bnaiyee

    Reply
    1. TARUN SHARMA Post author

      अतिशीघ्र इस पर नया विडियो प्रकाश में लायेंगें |
      धन्यवाद
      अल्टीमेट ज्ञान

      Reply

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